यह कहानी है उस महिला की जिसका विवाह तो उत्तर प्रदेश के रहने वाले एक पुलिस अधिकारी से हुआ था जिस कारण से उन्हें उत्तर प्रदेश की बहु जाए, पर वर्ष १९९४ में उत्तराखंड की पृथक राज्य की मांग ने उस उत्तर प्रदेश की बहु का सुहाग छीन लिया। उस ३२ वर्ष में दो बेटो जिनकी उम्र उस समय क्रमशः १३ और ११ साल थी उनकी परवरिश अपने पति के बाद किन मुश्किलों और संघर्ष आज ६६ वर्ष की आयु में पूर्ण करने के साथ किया वो शायद वही जानती है।
जी हां हम बात आज करेंगे उस एक अनजान महिला की जिसने अपने पति के तत्कालीन उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारी होते हुए देहरादून ट्रांसफर वर्ष १९९४ के अप्रैल में अपने पति स्वर्गीय श्री उमा कांत त्रिपाठी और अपने दो छोटे बच्चो जिनकी उम्र उस समय १३ और ११ साल ही थी के साथ देहरादून जैसे नए शहर में ट्रांसफर होने के बाद इस नए शहर में एक अलग खुशहाल दुनिया बनाने की सोच रखते हुए इस शांत शहर में अपने पति के साथ बसेरा बसाया।
अपने बच्चो का देहरादून के प्रतिष्ठित स्कूल सेंट जोसेफ्स अकादमी जैसे एक ऐसे स्कूल में जिसमे एडमिशन होना बहुत कठिन होता बच्चो की पूर्व के अकादमिक रिकार्ड्स और कुछ स्थानांरणत में छूट में चलते एडमिशन हो जाने ने श्री त्रिपाठी जी को अपने बच्चो के आने वाले भविष्य के प्रति निश्चिन्त कर दिया था। ज़िन्दगी का सफर सुचारु रूप से चल रहा था, फिर आया सितम्बर का वो मनहूस महीना और २ सितम्बर का वो मनहूस दिन जिस दिन उस वर्तमान उत्तर प्रदेश की बहु और भविष्य के उत्तराँचल की बहु कही जाने वाली महिला जिनका नाम यशोदा उमाकांत त्रिपाठी है की दुनिया ही उजाड़ कर रख दी।
यशोदा त्रिपाठी जी ने बताया की उत्तराखंड को अलग राज्य बनाए जाने की मांग उन दिनों ज़ोरो पर थी, इस ही बीच एक सितम्बर 1994 को खटीमा में पुलिस द्वारा जनांदोलन कर रहे लोगो पर गोलिया चलाने की घटना हो गयी, उस समय उमाकांत त्रिपाठी जी मसूरी के सी ओ के तौर पर तैनात होकर अपना कार्यभार संभाल रहे थे, तरीख थी 2 सितम्बर 1994 सुबह श्रीमती त्रिपाठी की बात उमाकांत त्रिपाठी जी से खैरियत पूछने के लिए फ़ोन पर होती है तो वो बताते है कि वो ठीक है, उसके कुछ समय बाद खटीमा में हुए गोलीकांड के विरोध में आंदोलनकारियों का एक जमावड़ा मसूरी के झूलाघर पर भी लगने लगा जो धरना देकर प्रदर्शन कर रहे थे और सरकार के खिलाफ नारे बाज़ी कर रहे थे। इस बीच कुछ महिलाओ की भीड़ वह स्थित पी ए सी कैंप में अंदर घुस जाती है और उनके हथियार खाई में फेकने लगती है तो उमाकांत त्रिपाठी जी उन्हें शांत करने की कोशिश करने लगते है, गुस्साई महिलाओ में से किसी एक महिला जिसने हाथ में हंसिया पकड़ी हुई थी उस से उमाकांत त्रिपाठी जी के हाथ पर लगने के कारण कट जाता है, यह देख वहाँ मौजूद पी ए सी के जवान बौखला जाते है और उमाकांत त्रिपाठी द्वारा रोकने के बावजूद फायरिंग कर देते है जिसमे कुछ लोग घायल हो जाते है और 7 लोगो की मृत्यु हो जाती है। पुलिस की फायरिंग और उसके बाद हुए लाठीचार्ज में घायल हुई महिलाओ को अपनी गाडी में बिठाकर खुद उमाकांत त्रिपाठी सेंट मेरी हॉस्पिटल लेकर जाते है तो डॉक्टर उनके हाथ से बहते खून को देखकर उनसे भी पट्टी बंधवा लेने के लिए कहते है, इस बीच भरी संख्या में आंदोलनकारियों की भीड़ भी सेंट मेरी हॉस्पिटल पहुंच जाती है।
ज्यों ही उमाकांत त्रिपाठी अपनी जैकेट पट्टी करवाने के लिए उतारते है तभी भीड़ में से कोई चिल्ला पड़ता है की यहाँ एक पुलिस वाला है जिसने हमारे लोगो पर गोलिया चलवाई, तभी भीड़ उग्र हो जाती है और उमाकांत त्रिपाठी पर हमला बोल देती है, भीड़ में जिसके पास जो भी हथियार था जैसे खुखरी, हंसिया इत्यादि से उमाकांत त्रिपाठी पर हमला किया जाता है नतीजन उमाकांत त्रिपाठी की मृत्यु हो जाती है। यशोदा त्रिपाठी जी बताती है की उमाकांत त्रिपाठी की मृत्यु के बाद मसूरी के तत्कालीन विधायक राजेंद्र शाह द्वारा उमाकांत त्रिपाठी के शव को लात मारी जाती है और अपशब्द बोले जाते है। यशोदा त्रिपाठी ने बताया की मसूरी में हुई अपने पति की हत्या की उन्हें जानकारी नहीं थी , दोपहर के वक़्त हलके हलके करके उनके आवास पर लोगो का तांता लगना शुरू हुआ, कुछ समय बाद उन्हें इस बात की जानकारी मिली की उनके पति उमाकांत त्रिपाठी को मसूरी में आंदोलनकारियों की भीड़ ने हमला करके मौत के घाट उतार दिया, यह बात सुनते ही उनके पैरो तले ज़मीन नही थी, जो परिवार सिर्फ 5 महीने पहले अपने बच्चो के उज्जवल भविष्य को सँवारने के उद्देश्य से देहरादून शिफ्ट हुआ था आज वो एक दम से बिखर गया था।
यशोदा त्रिपाठी जी उस घटनाक्रम को याद करके भावुक होकर बताती है की त्रिपाठी जी की मृत्यु की खबर सुनकर वह इतने सदमे में थी की डॉक्टर को उन्हें कण्ट्रोल करने के लिए नींद का इंजेक्शन तक देना पड़ा, जिस कारण वो उमाकांत त्रिपाठी जी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई थीं। आगे यशोदा त्रिपाठी जी ने बताया की उनके लिए अपने दोनों बच्चो आशीष और आलोक जिनकी उम्र उस वक़्त क्रमशः 13 और 11 वर्ष थी ख़ास तौर पर बड़े बेटे ने उस छोटी उम्र में अपने पिता को मुखाग्नि दी थी को संभालना चुनौती पूर्ण था। यशोदा त्रिपाठी जी आएगी बताती ही की त्रिपाठी की की मृत्यु के तकरीबन दो साल बाद उनकी पेंशन शुरू हुई, इन बीच के दो वर्षो में उन्होंने दोनों बच्चो के साथ मात्र `1800 रुपयों में ही घर और बच्चो की शिक्षा का खर्चा उठाया, उन्हें स्वर्गीय श्री त्रिपाठी जी के बाद पुलिस में कांस्टेबल के तौर पर नौकरी की पेशकश की गयी पर उन्होंने उसको अपने योग्य ना समझते हुए ठुकरा दिया क्योकि एक अन्य केस में सीओ की पत्नी को सीओ के समकक्ष ही पद दिया गया था।
आशीष त्रिपाठी
यह सवाल पूछने पर की क्या जिन लोगो ने स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी जी पर हमला कर उन्हें मौत के घात उतार दिया था उन पर कोई कानूनी कार्यवाही हुई और उन्हें सजा मिली तो यशोदा त्रिपाठी जी ने बताया की 14 लोगो को नामजद करके मुकदमा ज़रूर हुआ था पर उस मुकदमे के दौरान उन्हें कभी भी कोर्ट में पेश होने के लिए कोई सम्मन या नोटिस प्राप्त नहीं हुआ। वर्ष 2004 में उत्तराखंड की तत्कालीन कांग्रेस सरकार और केंद्र सरकार ने उन सभी 14 लोगो पर किये गए मुक़दमे वापस ले लिए थे जिसके बाद उन्हें जो थोड़ा बहुत इन्साफ मिलने की उम्मीद भी थी वो भी ख़त्म हो गयी। उस समय उनके दोनों बेटे भी ग्रेजुएशन कर रहे थे तो उन्होंने आगे अपने बच्चो के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए ही खुद को समर्पित करने की ठान ली, उनके समर्पण और त्याग का सुखद नतीजा तब निकला जब उनका बड़ा बेटे आशीष ने UPSC की परीक्षा पास की और वर्तमान में वह आयकर विभाग में आयुक्त के पद पर दिल्ली में तैनात है। उनके छोटे बेटे आलोक ने भी सफलताओ का अच्छा मुकाम हासिल करते हुए बॉलीवुड में जगह बनाई और अब वो एक सफल डायरेक्टर के तौर पर मुंबई में बसा हुआ है।
आलोक त्रिपाठी
श्रीमती त्रिपाठी कहती है की उत्तराखंड राज्य निर्माण जब हुआ था तो उन्हें भी उतनी ही ख़ुशी हुई थी जितनी हर राज्य वासी को हुई होगी, बस उन्हें दुःख सिर्फ इस बात का है कि उत्तराखंड के शहीदों में किसी ने भी स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी का नाम नहीं लिया, स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी किसी शत्रु सेना के नहीं अपितु उस ही सरकार के सिपाही थे जो उत्तराखंड राज्य निर्माण कि औपचारिकताए पूर्ण कर रही थी, यदि सरकार राज्य निर्माण के समय या उसके पश्चात भी स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी को एक बहादुर पुलिस अधिकारी का सम्मन मरणोपरांत देती तो वह सभी कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों के लिए मिसाल होता, परन्तु ऐसा कुछ होना तो दूर इस विषय में कुछ सोचा भी नहीं गया। यशोदा त्रिपाठी आगे कहती है कि राज्य निर्माण के बाद नेताओ को तो गद्दी मिल गयी मंत्री पद मिल गए, पर मुझे क्या मिला? राज्य निर्माण के बाद सरकारें आयी और चली गयी पर मेरे पति को उनके हक़ का सम्मन आज तक नहीं मिला। आज हम राज्य निर्माण की रजत जयंती का महोत्सव का जश्न मन रहे है पर उस व्यक्ति को भूल गए जिसने अपना फ़र्ज़ निभाते हुए घायल आंदोलनकारी महिलाओ को हॉस्पिटल पहुंचने का कार्य किया और फिर उस ही आंदोलनकारी उग्र भीड़ ने उन्हें मार डाला, मसूरी सदियों से एक ऐसी जगह के तौर पर विख्यात है जहा नवविवाहित अपने दाम्पत्य जीवन कि शुरुआत करते है और उस ही मसूरी ने उनका सुहाग उनसे छीन लिया।
यशोदा त्रिपाठी कहती है कि जब वो स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी के साथ देहरादून ट्रांसफर होकर परिवार के साथ देहरादून आयी थी तब वह तत्कालीन उत्तर प्रदेश की बहु थीं, उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद देहरादून में निवासरत होने के कारण वो उत्तराखंड की बहु हो गयी, उन्हें अपने पति के हत्यारो को सजा ना मिल पाने और उनके कोर्ट केस वापस सरकार द्वारा लिए जाने पर इन्साफ न मिलने का मलाल तो है पर उत्तराखंड की इस बहु को इस बात का इंतज़ार आज भी है की स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी कि मृत्यु भले ही ३१ वर्ष के बाद ही सही पर स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी को कम से कम ऐसा सम्मान तो मिले जिससे आने वाली पीढ़ी एक कर्तव्यनिष्ट अधिकारी के बलिदान को सदा याद रखे, देहरादून शहर में इतनी सड़के, पार्क, सरकारी कार्यालय एवं द्वार बनाए जाते है उनमे से किसी एक का नाम भी स्वर्गीय उमाकांत त्रिपाठी के नाम पर रख दिया जाए तो उनके परिवार को भी लगेगा कि राज्य निर्माण में उनका भी कुछ योगदान था।












