Wednesday, September 16, 2026
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फेल दवाओं को “नकली” बताना गलत: फार्मा कंपनियों ने मीडिया रिपोर्टिंग पर उठाए सवाल

  • फार्मा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने कहा — ‘तकनीकी वजहों से फेल दवाओं को नकली कहना गलत, इससे ब्रांड की छवि खराब होती है’

फार्मा उद्योग से जुड़े प्रमुख निर्माताओं और विशेषज्ञों ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दवा उद्योग से संबंधित कई गंभीर मुद्दों को उठाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तकनीकी कारणों से ‘फेल’ हुई हर दवा को “नकली” कहना गलत है और इससे ब्रांड की छवि तथा औषधि निर्माता की प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचता है।

प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि “अच्छी गुणवत्ता वाली दवाएं” और “नकली दवाएं” दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। अच्छी दवाएं वैज्ञानिक मानकों और तय गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रिया के अनुसार बनाई जाती हैं, जबकि नकली दवाएं या तो घटिया सामग्री से बनती हैं या उनकी जानकारी और लेबलिंग में जानबूझकर गड़बड़ी की जाती है।

उद्योग विशेषज्ञों ने बताया कि जिन कंपनियों के पास राज्य या केंद्र सरकार से विधिवत निर्माण लाइसेंस होता है, वे तय प्रक्रिया और मानकों का पालन करती हैं। उनका उद्देश्य नकली दवा बनाना नहीं होता। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मीडिया में हर ‘फेल’ दवा को ‘नकली’ बताकर प्रचारित किया जाता है, जिससे निर्माता कंपनी और उसकी साख पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

प्रेस वार्ता में यह भी बताया गया कि अधिकतर दवाएं तकनीकी कारणों से NSQ (Not of Standard Quality) घोषित की जाती हैं। इन कारणों में pH में थोड़ा अंतर, दवा के घुलने (डिसॉल्यूशन) में विलंब, लेबलिंग की त्रुटियाँ या डिसइंटीग्रेशन टेस्ट में बदलाव जैसे मामूली मुद्दे शामिल होते हैं। हर NSQ रिपोर्ट का मतलब यह नहीं होता कि दवा मरीज के लिए हानिकारक या बेअसर है।

उद्योग प्रतिनिधियों ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) के प्राथमिक अलर्ट पर बिना अंतिम पुष्टि के खबरें प्रकाशित की जाती हैं। जबकि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 25(3) के तहत निर्माता को Central Drug Laboratory (CDL) में दोबारा परीक्षण का अधिकार होता है। जब तक फाइनल रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक किसी भी दवा को ‘फेल’ या ‘नकली’ बताना अन्यायपूर्ण है।

एक बड़ा मुद्दा यह भी उठाया गया कि जहां फेल हुए सैंपलों की जानकारी तत्काल सार्वजनिक कर दी जाती है, वहीं अगर वही सैंपल बाद में पास हो जाए, तो उसकी कोई सूचना सार्वजनिक नहीं की जाती। यह प्रक्रिया एकतरफा है और इससे निर्माता की साख को अनावश्यक रूप से क्षति पहुंचती है।

STP और DGCI गाइडलाइन्स की अनदेखी पर चिंता जताते हुए वक्ताओं ने कहा कि DGCI की ओर से संयोजन दवाओं के परीक्षण के लिए तय की गई Standard Testing Procedure (STP) का कई बार पालन नहीं होता। इससे गलत रिपोर्टिंग होती है और गुणवत्ता वाली दवाएं भी NSQ घोषित हो जाती हैं।

उत्तराखंड को देश में गुणवत्तायुक्त औषधि निर्माण के हब के रूप में जाना जाता है। लेकिन हाल के समय में कुछ बाहरी राज्यों की कंपनियां उत्तराखंड के पते पर दवाएं बनवाने का दावा कर रही हैं, जबकि उन पतों पर फैक्ट्रियां मौजूद ही नहीं हैं। इससे न केवल नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि राज्य की छवि को भी नुकसान पहुंच रहा है।

प्रेस वार्ता के समापन पर यह संदेश दिया गया कि दवा निर्माण केवल व्यापार नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है।

उद्योग से जुड़े लोगों ने आग्रह किया कि –

सच्ची जानकारी को पहचाना जाए,

गलत सूचनाओं को रोका जाए,

और सिस्टम को पारदर्शी बनाने के लिए सभी मिलकर कार्य करें।

प्रेस वार्ता में फार्मा जगत की प्रतिष्ठित हस्तियाँ प्रमोद कालानी, पी एस चावला, संजय सिंघारिया, पी के बंसल, निखिल गोयल, आर सी जैन और कुलदीप सिंह आदि उपस्थित रहे।।

 

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