Thursday, August 27, 2026
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रामपुर तिराहा कांड: 32 साल बाद फर्जी हथियार बरामदगी मामले में तीन पूर्व पुलिसकर्मी दोषी, विशेष सीबीआई अदालत ने सुनाई सजा

मुजफ्फरनगर। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे चर्चित और संवेदनशील रामपुर तिराहा गोलीकांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में 32 वर्ष बाद न्याय की दिशा में एक बड़ा फैसला सामने आया है। मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत ने मंगलवार को तत्कालीन छपार थानाध्यक्ष (एसएचओ) बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार को दोषी करार देते हुए प्रत्येक को डेढ़-डेढ़ वर्ष के कठोर कारावास और 21-21 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।

विशेष सीबीआई अदालत के पीठासीन अधिकारी डी.के. फौजदार ने दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। मामले की जानकारी अधिवक्ता अनुराग वर्मा ने मीडिया को देते हुए इसे उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए न्याय की महत्वपूर्ण जीत बताया।

आंदोलनकारियों को फंसाने के लिए रची गई थी फर्जी कहानी

यह मामला 1-2 अक्टूबर 1994 की उस दर्दनाक घटना से जुड़ा है, जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी दिल्ली के राजघाट की ओर कूच कर रहे थे। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद हुए विवाद के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और फायरिंग की, जिसमें कई आंदोलनकारियों की मौत हुई और अनेक घायल हुए। उस घटना के बाद पुलिस पर आंदोलनकारी महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ के गंभीर आरोप भी लगे थे।

घटना के बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए दावा किया कि आंदोलनकारियों के पास से अवैध तमंचे, कारतूस और अन्य हथियार बरामद हुए थे तथा उन्होंने पुलिस पर फायरिंग की थी। इसी आधार पर कई मुकदमे दर्ज किए गए।

 

सीबीआई जांच में खुली साजिश की परतें

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच में सामने आया कि आंदोलनकारियों से हथियार बरामद होने का दावा पूरी तरह फर्जी था। सीबीआई ने पाया कि जब्ती मेमो तैयार कर झूठे साक्ष्य बनाए गए और गवाहों से दबाव में हस्ताक्षर कराए गए थे। जांच एजेंसी ने निष्कर्ष निकाला कि आंदोलनकारियों को बदनाम करने और अदालत को गुमराह करने के लिए यह पूरी कहानी रची गई थी।

इसके बाद सीबीआई ने तत्कालीन एसएचओ बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश सहित विभिन्न धाराओं में चार्जशीट दाखिल की।

32 साल बाद आया ऐतिहासिक फैसला

करीब तीन दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद विशेष सीबीआई अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई। अदालत के इस फैसले को उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। आंदोलनकारियों और उनके परिजनों का कहना है कि भले ही न्याय मिलने में लंबा समय लगा, लेकिन आखिरकार सच की जीत हुई।

यह फैसला केवल तीन पुलिसकर्मियों की सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और झूठे साक्ष्य बनाकर न्याय व्यवस्था को गुमराह करने वालों को अंततः जवाबदेह होना पड़ता है।

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