Monday, November 2, 2026
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देहरादून में भाई-बहन के रिश्ते और रक्षाबंधन का पर्व के लिए बहने तैयार, शहर में पतंगबाज़ी के लिए भी हो रही खरीददारी।

देहरादून, अपनी हरियाली, पहाड़ी सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है, लेकिन यहाँ की सबसे खूबसूरत पहचान उसके लोगों के रिश्तों में बसती है। इन रिश्तों में भाई-बहन का संबंध एक अनमोल धरोहर की तरह है। इस पवित्र रिश्ते का सबसे बड़ा उत्सव है रक्षाबंधन, जिसे देहरादून में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कल यानी 9 अगस्त को रक्षाबंधन का त्योहार मानाने के लिए आज बहनो की भीड़ से देहरादून शहर के हर क्षेत्र का बाज़ार गुलज़ार रहा।

कल रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र (राखी) बांधकर उनके जीवन में खुशहाली और दीर्घायु की कामना करकेंगी, वही बदले में भाई अपनी बहनों को उपहार और जीवनभर रक्षा का वचन देंगे। देहरादून के हर गली-मोहल्लों में यह दिन बचपन से ही रंगीन यादों से जुड़ा होता है — सुबह-सुबह घरों में मिठाइयों की खुशबू, राखी की थालियों में सजी आरती, चावल और कुमकुम का तिलक, और बहनों की मुस्कान, जो हर घर को एक अलग ही ऊर्जा से भर देती है।  देहरादून की गलियों में रक्षाबंधन से पहले ही बाजार सज जाते हैं — पलटन बाजार, राजपुर रोड, घंटाघर, पाटेलनगर और गांधी रोड पर राखियों की रंगीन दुकानों की कतारें, मिठाइयों की महक और भीड़भाड़ का एक अपना ही अलग नजारा होता है।

अगर हम रक्षाबंधन की पुरानी यादों में जाएं तो यह सिर्फ राखी का त्योहार नहीं होता था, बल्कि पतंगबाज़ी का भी दिन होता था। 80 और 90 के दशक में देहरादून के मोहल्लों की छतें रक्षाबंधन पर रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाती थीं। बच्चे और बड़े, सब पतंग उड़ाने में मशगूल रहते थे। राखी की रस्म पूरी होते ही भाई अक्सर अपने दोस्तों के साथ छत पर चढ़ जाते और “वो काटा…!” की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंज उठती। पतंग की डोर (मांझा) खास तरीके से तैयार की जाती थी, जिसे बनाने में कई दिन लगते थे। बाजार में ‘गिल्ला-पतंग’ से लेकर ‘चर्खी’ और ‘लटाई’ तक, सब बिकते थे। देहरादून की ठंडी हवा में उड़ती पतंगों का नजारा त्योहार की रौनक को दोगुना कर देता था।

 

धामावाला में प्रमुख पतंग विक्रेता महमूद ट्रेडर्स के मालिक महमूद हसन ने बताया की वक्त बदलने के साथ देहरादून में पतंगबाज़ी का क्रेज भी कम हो गया है। अब मोबाइल, वीडियो गेम और सोशल मीडिया ने बच्चों को छतों से दूर कर दिया है। पहले जहां रक्षाबंधन के एक हफ्ते पहले से ही पतंग की दुकानों पर भीड़ लगती थी, वहीं आज पतंग विक्रेता सिर्फ गिने-चुने ग्राहक देखते हैं।

 

पलटन बाजार, टेगोर विला, चुक्खूवाला और झंडा बाजार में कुछ पुराने दुकानदार अब भी पतंग बेचते हैं, लेकिन उनका कहना है कि पहले की तरह बिक्री नहीं होती। प्लास्टिक की बनी चीन से आई सस्ती पतंगों ने पारंपरिक कागज़-पतंग की बिक्री पर असर डाला है। कई विक्रेताओं ने तो पतंग बेचने का काम ही छोड़ दिया और मिठाई, सजावट या राखी का व्यवसाय अपना लिया। इसके बावजूद, देहरादून में कुछ मोहल्ले अब भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। मसूरी-देहरादून रोड, प्रेमनगर, और डालनवाला जैसे इलाकों में कुछ घर आज भी रक्षाबंधन के दिन पतंगबाज़ी करते हैं, ताकि पुरानी खुशबू और माहौल जीवित रह सके।

 

रक्षाबंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और सुरक्षा का वचन है। देहरादून में यह पर्व अपने सांस्कृतिक रंग और मानवीय भावनाओं के कारण खास पहचान रखता है। पतंगबाज़ी भले ही पहले जैसी जोश और रौनक से न हो, पर यह त्योहार अब भी हर दिल को जोड़ने का काम करता है। पुराने समय की छतों पर उड़ती पतंगों और आज की राखियों में सजे रिश्तों का मोल — दोनों ही इस शहर की आत्मा में बसते हैं।

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