Sunday, November 1, 2026
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महाराष्ट्र में खत्म नहीं हुआ एकनाथ शिंदे का ‘ऑपरेशन टाइगर’, अब उद्धव की सेना का क्या होगा?

  • महाराष्ट्र में शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट को प्रतिद्वंद्वी एकनाथ शिंदे गुट से बार-बार मात खानी पड़ रही है। कुछ दिनों के भीतर ही उद्धव को दो बड़े आघात झेलने पड़े।

पहले उनके 6 लोकसभा सदस्य शिंदे के साथ चले गए और फिर विधान परिषद सदस्य सचिन अहिर ने भी शिंदे का दामन थाम लिया। पाला बदलते ही सचिन को उपसभापति पद की मानो लॉटरी लग गई। इस बीच, उद्धव के दो और विधायकों के शिंदे सेना में जाने की चर्चा है। कयास हैं कि उद्धव सेना के कम से कम 11 विधायक शिंदे के साथ जा सकते हैं। शिंदे का संदेश । सचिन का जाना बड़ा झटका है। वह उद्धव और आदित्य के विश्वासपात्र रहे हैं। दक्षिण मुंबई और कामगार क्षेत्र में उनकी तूती बोलती है। उद्धव के बेटे आदित्य को वर्ली विधानसभा सीट जितवाने में उनकी बड़ी भूमिका है। फिर भी प्रश्न तो उठता ही है कि सचिन आखिर शिंदे के साथ क्यों हो लिए? शिंदे ने भी अपनी धाकड़ विधान परिषद की निवर्तमान उपसभापति नीलम गोऱ्हे को दोबारा अवसर क्यों नहीं दिया? इसका जवाब ‘अवसर और आवश्यकता’ के राजनीतिक सिद्धांत में छिपा हुआ है। शिंदे BJP के नेतृत्व को यह दिखाना चाहते हैं कि उसके बाद राज्य में सबसे ताकतवर उनकी ही पार्टी है। इस तरह सत्ता पर देर-सबेर उनका ही दावा बनता है।

 

दूसरा कारण है नीलम से BJP की नाराजगी। सतारा जिला परिषद चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ महायुति के नेताओं के साथ धक्कामुक्की व पुलिस कार्रवाई को लेकर नीलम ने एसपी तुषार दोशी और अन्य पुलिस अधिकारियों के निलंबन का आदेश दिया था। सीएम देवेंद्र फडणवीस इससे इतने नाराज हो गए कि उन्होंने कह दिया, उपसभापति का आदेश कोई ‘ब्रह्मवाक्य’ नहीं होता। कानूनी पेंच । सचिन 2022 में एकीकृत शिवसेना से विधान परिषद में चुने गए थे। पार्टी में फूट के बाद वह उद्धव के साथ रह गए। उन्होंने पार्टी बदली है, फिर भी दलबदल कानून के तहत कार्रवाई होने के आसार कम हैं। वह कह सकते हैं कि वह शिवसेना के सदस्य हैं और अब अधिकृत शिवसेना में हैं, इसलिए उन्होंने पार्टी नहीं बदली। यह कानूनी पेचीदगी का मामला है।

 

सचिन अहिर गैंगस्टर अरुण गवली के भांजे हैं। अरुण गवली की दिशा अलग थी, सचिन की दिशा रचनात्मक रही। वह 1993 में मुंबई में सक्रिय हुए। कांग्रेस से जुड़े इंटक से संलग्न ‘राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ’ के महासचिव और अध्यक्ष रहे। 1999 में शरद पवार की NCP से वर्ली से विधायक बने।

‘ऑपरेशन टाइगर’ में जो तीन सांसद बचे, उनमें अरविंद सावंत और अनिल देसाई दक्षिण मुंबई के हैं व राजाभाऊ वाजे नासिक के। सचिन कम से कम मुंबई में सावंत और देसाई की चुनौतियों का सामना का सकते हैं। शिंदे के साथ जाने वाले 6 सांसदों में धाराशिव के ओमराज निंबालकर हैं। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार वहीं की हैं। पद्मसिंह पाटील उनके भाई हैं। निंबालकर और पाटील परिवार में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता पुरानी है। ओमराजे के पिता की हत्या का आरोप पद्मसिंह पर था, लेकिन 20 साल बाद वह निर्दोष बरी हुए हैं। पद्मसिंह के पुत्र राणा जगजीत सिंह BJP के साथ हैं और उनके प्रतिद्वंद्वी शिंदे सेना के साथ। आंकड़ों पर नजर । शिंदे के जरिए 6 सांसदों को लाने का जो ‘ऑपरेशन टाइगर’ चला, उसके पीछे BJP का राजनीतिक दांव अवश्य है। वह लोकसभा में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम और नीतीश कुमार की JDU पर निर्भरता कम करना चाहती है। अब भी BJP लोकसभा में बहुमत के दो तिहाई आंकड़े से पीछे है, तो ‘ऑपरेशन टाइगर’ जैसे अभियान आगे भी चल सकते हैं। सचिन अहिर को उपसभापति पद देना और शिंदे के साथ आना इसी कड़ी का अंग लगता है। अब यह मोर्चा उद्धव के 20 विधानसभा सदस्यों की ओर भी बढ़ सकता है। शिंदे और BJP, दोनों इसके लिए उत्सुक दिखते हैं। सिर्फ टाइमलाइन का इंतजार है। इससे यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि आखिर उद्धव की सेना का क्या होगा, क्या वह अपने आप खत्म हो जाएगी? इसका जवाब फिलहाल ‘नहीं’ है। जब तक व्यक्ति आधारित राजनीति है, तब तक ऐसी पार्टियों का अस्तित्व टिका रहेगा। लेकिन, टिके रहने के लिए भी राजनीतिक शक्ति दिखानी होगी।

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